जे एन यू परिसर की छात्रा के मन की बात

जे एन यू परिसर महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से इस देश में एक मिसाल रहा है। मैं इस विश्वविद्यालय में पिछले 20 महीनों से हूँ और मैंने इस दौरान यहाँ के वातावरण को बहुत करीब से देखा है और जाना भी हैं। मैंने कभी कल्पना भी नहीं थी कि भारत में इतना बेहतरीन और ख़ूबसूरत सोच को विकसित करने वाला विश्वविद्यालय परिसर भी मौजूद है। मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं यहाँ की छात्रा हूँ और इस बात का बेहद दुःख है कि यहाँ आने वाली अगली पीढ़ी को यहाँ की इस ख़ूबसूरती की एक झलक भी शायद नसीब ना हो पाए।

हर लड़की की ख़्वाहिश होती है कि उसे भी समाज में उतनी आज़ादी मिले कि वो अपनी बात को बिना डरे सबके सामने कह पाए, एक अच्छी शिक्षा ले पाए, अपनी मर्ज़ी से बाहर आ जा सके और रात में भी दिन की ही तरह, बिना डरे, सड़कों पर निकल सके। उसे अपने बारे में सोचने की स्वतंत्रता हो और अपनी जिंदगी को अपने दम पर जीने की आज़ादी भी हो। जब वो मनचाहे कपड़े पहनकर सड़कों पर निकले तो लोग उसे किसी विचित्र प्राणी की तरह न देखें, और उसका चरित्र मंथन ना करें। उन्हें अपना मन पसंद व्यवसाय चुनने की भी उतनी ही आज़ादी हो जितना एक मन पसंद विषय चुनने की। उन्हें सवाल करने की भी आज़ादी हो और अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता हो।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ना सिर्फ हर तबके की छात्राओं को खुलकर जीने की आज़ादी देता है बल्कि उन्हें उतना सक्षम भी बनाता है कि वे उन सभी महिलाओं के लिए बाहर जाकर लड़ सकें जिन्हें ये आज़ादी कभी नसीब नहीं हो पाई। मैं यहाँ से पहले दो अन्य विश्वविद्यालयों की भी छात्रा रही हूँ, पर यहाँ आने से पहले कभी ये सोच भी नहीं सकती थी कि इस तरह का माहौल किसी विश्वविद्यालय में हो सकता है। यह विश्वविद्यालय परिसर ना सिर्फ महिलाओं के लिए सुरक्षा की दृष्टि से उत्तम रहा है बल्कि यह महिलाओं को वो सभी आज़ादी भी देता आया है जिनका हमें हमारा संविधान अधिकार देता है। यहाँ महिलाएँ ना सिर्फ बेख़ौफ़ होकर बात करती हैं बल्कि बिना डरे अपने हक़ों के लिए आवाज़ भी बुलंद करती रही हैं। यहाँ हम हमारी मर्ज़ी के कपड़े भी उसी उत्साह और निडरता से पहनते हैं जितने उत्साह और निडरता से यहाँ की सड़कों पर गाना गाते और नाचते हुए चलते हैं। यहाँ हम मासिक धर्म की बात भी उतने ही सहज ढंग से करते हैं जितनी सहजता से हम राजनीति से संबंधित चर्चाएँ करते हैं। यहाँ हम बालों में बड़े बड़े फ़ूल लगाकर बाहर निकलें या पत्ते, हमें हमारी वेषभूषा के बूते पर कोई भी तोलने की कोशिश नहीं करता क्योंकि जे एन यू परिसर में बदलाव का सम्मान किया जाता है उसे नकारा नहीं जाता। हम यहाँ देश विदेश की गतिविधियों की उतनी ही बारीकियों के साथ चर्चा करते हैं जितनी बारीकी से हम हमारे शोध के विषय की चर्चा करते हैं।

मैं एक महिला विद्यार्थी हूँ और परिसर में कहीं भी किसी भी वक़्त बेख़ौफ़ घूम सकती हूँ। चाहे यहाँ शाम के चार बजे हों या आधी रात के, सड़कों पर किसी भी प्रकार का कोई ख़तरा महिलाओं को नहीं होता है और यहाँ के विद्यार्थी अपने विषयों पर रात रात भर भी ढाबों पर बैठकर चाय के साथ हमेशा से विचार- विमर्श करते आये हैं। यहाँ का प्रकृति प्रेम देखकर तो अच्छे भले लोग हैरान रह जाएंगे जब वे देखेंगे कि एक प्रोफ़ेसर कक्षा में पढ़ाने के बाद बाहर निकलकर सीधा एक कुत्तों के झुंड के पास जाता है और उनसे बात करने लगता है और उनके हाल पूछता है। कभी कभी तो कक्षाएं भी पेड़ों के नीचे बैठकर खुले में सभी जानवरों के व पशु पक्षियों की हाज़िरी में हुआ करती हैं। सबसे ख़ूबसूरत पहलू यहाँ का ये है कि ये कक्षाएँ या किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श यहाँ किसी भी समय-सीमा के बंधन में नहीं बंधे हैं और अक्सर समय सीमा को पार कर जाया करते हैं। यहाँ कक्षाओं में किसी को भी आने की मनाही नहीं है, चाहे वो व्यक्ति किसी दूसरे विभाग का हो या कहीं बाहर का हो। यहाँ हर आयु वर्ग के लोग बाहर से इन कक्षाओं में बैठकर पढ़ने आते हैं, क्योंकि जे एन यू में ज्ञान को किसी भी डिग्री या उपस्थिति रिकॉर्ड से ज्यादा महत्ता दी जाती है। यहाँ पर वे लोग भी कक्षाओं में भाग लेते हैं जो अपनी नौकरी या व्यापार से रिटायर हो चुके हैं और वो भी जो उस विषय विशेष के बारे में सिर्फ सीखना चाहते हैं। परिसर में कई होस्टलों में महिला और पुरुष विद्यार्थी दोनों रहते हैं। चूँकि उनका होस्टल में अलग अलग भाग (दायाँ और बायाँ) विभाजित है, दोनों का मेस एक साथ है। सभी एक साथ टेबल पर बैठकर एक ही हॉल में खाना खाते हैं और खाते खाते अनेक विषयों पर व मुद्दों पर चर्चाएं भी करते हैं। परिसर में पुरुष और महिला एक दूसरे के सामने बिल्कुल सहज होते हैं, जैसे कि एक इंसान को एक इंसान के सामने होना चाहिए। इसी कारण महिलाएं खुलकर अपने विचारों को सबके सामने रख पाती है। यहाँ की सबसे ख़ूबसूरत बात शायद यही है कि यहाँ एक ‘अच्छा विद्यार्थी’ बनने के बजाय आपको एक अच्छा इंसान बनना सिखाया जाता है और सामाजिक साँचे में ढली हुई सोच से कुछ हटकर सोचना सिखाया जाता है।

जे एन यू की महिलाएं आपके-हमारे ही समाजिक परिवेश से आई हुई महिलाएं हैं जिन्हें पैतृक सत्ता ने हमेशा दबाकर रखा। यही पैतृक सत्ता अपने विचारों को जे एन यू परिसर में थोपकर यहां की इस समानता की विचारधारा को मैला करना चाहती है। शायद ये आज़ादी जो महिलाओं को या सभी तबकों की छात्राओं को यहाँ पर मिलती आयी है उसे हमारी पैतृक सत्ता पचा नहीं पा रही है और इसीलिए रात भर खुलने वाले ढाबों को हमारे वर्तमान जे एन यू प्रशासन ने एक समय सीमा में बांध दिया और ये ढ़ाबे अब रात के 11 बजे बंद होने लगे हैं। रात में सड़कें एकदम सुनसान रहने लगी हैं लड़कियों की सुरक्षा के लिए जो रोड की लाइटें पूरी रात जली रहा करती थी, वे भी अब बंद होने लगी हैं। यहाँ पर एक संस्था GSCASH के नाम से हुआ करती थी जिसका काम सभी को यौन शिक्षा व समस्याओं से अवगत कराना व सभी प्रकार के लैंगिक शोषण पर तुरंत कार्यवाही करना था। इस संस्था विशेष में प्रशासन की कहीं कोई भूमिका नहीं थी क्योंकि इसे अध्यापक व छात्र मिलकर संभाला करते थे। इस संस्था को वर्तमान कुलपति ने बंद करवा दिया और इन सबकी जिम्मेदारी प्रशासन के हाथ में दे दी। शायद यही कारण है कि अतुल जोहरी जैसे आरोपी जिस पर 9 लड़कियों ने एक साथ यौन शोषण आरोप लगाकर FIR दर्ज़ कराई है, वो खुला घूम रहा है और उस पर प्रशासन कोई भी कार्यवाही नहीं कर रहा है। इन सबके अलावा प्रशासन महिलाओं के कमरों में उनकी उपस्थिति के बिना ही वॉर्डन चेक के बहाने उनकी हर एक चीज़ को छेड़ने लगा है। यहाँ होस्टलों में आसामयिक रेड डलवाकर हम महिला विद्यार्थियों ना सिर्फ तंग किया जाने लगा है बल्कि खाने का पैसा दुगुना बढ़ाकर व परिसर में आने वाली कई तरह की स्कॉलरशिप्स पर रोक लगाकर उनकी कमर तोड़ी जा रही है ताकि वे अपनी पढ़ाई पर पूरी तरह ना ध्यान दे पाए और इन्हीं सब बातों में उलझकर रह जाये। इस परिसर में निचले तबकों से आने वाले लोगों और महिलाओं को जो ज़रा सी सहूलियत (सबकी तुलना में 5 अंक ज्यादा) प्रवेश प्रक्रियाओं के दौरान दी जा रही थी वे भी प्रशासन द्वारा रोक दी गयी हैं। मुझे इस बात की खुशी थी कि कोई विश्वविद्यालय ऐसा भी है जिसमें महिलाओं की संख्या पुरुष से थोड़ी अधिक है, पर ये भी प्रशासन को ग़वारा नहीं था और मुझे अफ़सोस है कि अब ऐसा माहौल आगे शायद कभी यहां देखने को ना मिले।

हम आख़िर किस सोच से आगे बढ़ने की कोशिश करना चाहते हैं इस पर हम सभी को पुनर्विचार करने की जरूरत है। जहाँ हम एक और चाहते हैं कि महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले वहीं हम दूसरी तरफ इस तरह की सुरक्षा को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। जहाँ हम चाहते हैं कि महिलाओं को शिक्षा में बराबरी का हक़ हो, वहीं हम सभी पब्लिक शिक्षण संस्थानों को उनका निजीकरण करके उस शिक्षा के अधिकार को उनसे छीनना भी चाहते हैं। हम जहाँ चाहते हैं कि नारी समाज को हिम्मत दिखाकर इस सामाजिक ढांचे से कुछ ऊपर आने की जरूरत है तो दूसरी तरफ हम पढ़ने की इच्छा रखने वाली बिना डरे बात करने वाली व सड़कों पर बेख़ौफ़ घूमने वाली लड़कियों पर पाबंदी लगाना चाहते हैं। इन सभी बातों को साथ में रखकर हमें इन्हें फिर से टटोलने की जरूरत है और महिलाओं के अच्छे भविष्य के बारे में सोचते हुए हमें जे एन यू के सुरक्षित माहौल को ख़त्म करने के बजाय यहाँ के तजुर्बे से सामाजिक ढांचे को बदलने की जरूरत है।

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